विद्या ददाति विनयम्

            नमस्कार दोस्तों. बहुत दिनों के बाद मैं एक बार फिर आप सबकी सेवा में संत सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज की अमृतमय वाणी को लेकर  उपस्थित हुआ हूँ. आशा है कि आप सबको मेरा ये प्रयास पसन्द आएगा. जय गुरु महाराज....🙏🌹.............................................................................................................               

             नम्रता से विद्या आती है और विद्या से नम्रता आती है. पहले नम्रता से विद्या सीखते हैं और विद्या सीखकर विशेष नम्र हो जाते हैं. इसलिए कहा गया है कि " विद्या ददाति विनयम्."

             व्याकरण के एक पंडित आए थे. वे बड़े नम्र थे. इतने नम्र थे कि उससे विशेष नम्र होना असंभव. वे चूड़ा और गुड़ खाते थे. मैंने कहा कि इन्होंने "विद्या ददाति विनयम्" को पूर्णरूपेण चरितार्थ कर लिया है. उन्होंने अपने को अति सरल बनाया था. नम्रता सीखो. वहाँ तक सीखो जहाँ इसकी पराकाष्ठा है. और इच्छा मत रखो. माँगो, तो यही माँगो कि – " भगति अचल वर माँग री."

            ( महर्षि मेँहीँ सत्संग– सुधा सागर, प्रथम भाग, पृष्ठ 475 से साभार)


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