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झूठ का परिणाम (कर्ण की कथा)| JHUTH KA PARINAM ( KARN KI KATHA)

नमस्कार दोस्तों......🙏🌹. आज मैं आप सबके सम्मुख संत आचार्य श्री शचीकांत स्वामी जी महाराज रचित आध्यात्मिक पुस्तक "संत बोध कथाएँ" से एक कथा " झूठ का परिणाम" (कर्ण की कथा) लेकर उपस्थित हुआ हूँ। आशा करता हूँ कि आप सबको मेरा यह सद्प्रयास पसन्द आएगा।  ....................................................................................................................       कर्ण ने सुना, अभी भीष्म पितामह अद्वितीय धनुर्धर हैं। इनके आगे इन्द्र और शंकर भी गम खाते हैं। भीष्म की प्रशंसा सुन कर कर्ण ने पता करना शुरू किया कि आखिर भीष्म यह विद्या या तालीम कहाँ जाकर, किससे पढ़ कर हासिल किए हैं। पता लग गया। वह मन ही मन....... बिना किसी के आगे बोले निर्णय किया कि मैं भी उन्हीं से जाकर वह अमोघ धनुर्विद्या सीख कर दादा जी के आगे अपना अद्भुत हस्त लाघव चमत्कार दिखलाऊँगा।       कर्ण बड़ा ही साहसी, अभिवादनशील और कट्टर–सिद्धांतवादी था। ज्ञातव्य सूत्र के मुताबिक वह तैयार होकर महेन्द्र पर्वत पर विराजमान परशुराम जी के पास जाकर उनके पावन युगल श्रीचरणों में अपना प्रणाम निवेदित ...

विद्या ददाति विनयम्

            नमस्कार दोस्तों. बहुत दिनों के बाद मैं एक बार फिर आप सबकी सेवा में संत सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज की अमृतमय वाणी को लेकर  उपस्थित हुआ हूँ. आशा है कि आप सबको मेरा ये प्रयास पसन्द आएगा. जय गुरु महाराज....🙏🌹.............................................................................................................                             नम्रता से विद्या आती है और विद्या से नम्रता आती है. पहले नम्रता से विद्या सीखते हैं और विद्या सीखकर विशेष नम्र हो जाते हैं. इसलिए कहा गया है कि " विद्या ददाति विनयम्."              व्याकरण के एक पंडित आए थे. वे बड़े नम्र थे. इतने नम्र थे कि उससे विशेष नम्र होना असंभव. वे चूड़ा और गुड़ खाते थे. मैंने कहा कि इन्होंने "विद्या ददाति विनयम्" को पूर्णरूपेण चरितार्थ कर लिया है. उन्होंने अपने को अति सरल बनाया था. नम्रता सीखो. वहाँ तक सीखो जहाँ इसकी पराकाष्ठा है. और इच्छा मत रखो. माँगो, तो यह...

अद्वय भाव कैसा होना चाहिए | WHAT KIND OF BEING ONENESS SHOULD BE?

संत सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज की वाणी.................... ............................................................      यह जो भादो में अनन्त पूजा होती है, वह अनन्त नहीं है। यथार्थ में अनन्त होना चाहिए। वह एक परमात्मा है। जैसे शून्य में कोई थाह नहीं मालूम होती कि वह कहाँ तक है। वायुयान जाए, चाहे कोई पक्षी उड़े तो शून्य का अंत नहीं होगा। इसी तरह जो लोग विशेषज्ञ हैं, वे ईश्वर को जानते हैं। साधक लोग केवल जानते ही नहीं हैं, प्रत्यक्ष करके पहचानते भी हैं। पहचान लेने पर परमात्मा से अद्वय भाव हो जाता है।      परमात्मा मुझसे अलग है, ऐसा नहीं; बल्कि मैं और परमात्मा एक ही हूँ – यह है अद्वय भाव। इसमें कुछ करना नहीं होता। सब चुप हो जाते हैं। श्रीराम ने गुरु वशिष्ठ से पूछा था कि अद्वय भाव कैसा होता है? तो वे चुप रहे। श्रीराम ने पुनः पूछा – "गुरु महाराज! आप रुष्ट तो नहीं हो गए हैं? मैं पूछता हूँ और उत्तर नहीं देते?" वशिष्ठ जी ने कहा – " तुम जबसे पूछ रहे हो, मैं तबसे उत्तर दे रहा हूँ। अद्वय भाव में चुप ही रहना  होता है।"      इसलिए मैं ...

गुरु में निष्ठा रखें

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                   नमस्कार दोस्तों....🙏🌹. आज मैं एक बार फिर परम संत सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज की अमृतमय वाणी लेकर उपस्थित हुआ हूँ। आशा है आप सभी को मेरा यह प्रयास पसन्द आएगा। .............................................................................................................. बात–बात में गुरु की आवश्यकता होती है। बिना गुरु के एक अक्षर नहीं सीख सकते। इसलिए ऐसी भक्ति करो कि जिसका अंदाजा नहीं। सदा गुरु के साथ कोई रहे, यह भी संभव नहीं। इसलिए कबीर साहब ने कहा है –  जौं गुरु बसै बनारसी, शिष्य समुन्दर तीर।   एक पलक बिछुड़ैं नहीं, जौं गुन होय शरीर।।         हमेशा गुरु की याद करो। द्वापर युग में द्रोण एक गुरु हुए थे। कौरव–पाण्डव को वे धनुर्विद्या सिखलाते थे। एक भील–पुत्र भी गया, उनसे सीखने के लिए तो आचार्य द्रोण ने कहा–"मैं राजकुमारों को सिखलाता हूँ, दूसरे को नहीं।" वह भील–पुत्र था एकलव्य। उसने द्रोणाचार्य की मूर्ति बनाई और उसका ध्यान करते हुए धनुर्विद्या का अभ्यास करने लगा। होते–होते उस विद्य...

संतों का ज्ञान सतत् स्मरणीय

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नमस्कार दोस्तों....🙏🌹 SURENDRA'S BLOGS में आपका पुनः स्वागत है। आज मैं एक बार फिर से आपको परम संत सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज की अमृतमय वाणी का पान कराता हूं। आशा है आपको मेरा यह प्रयास पसन्द आएगा। धन्यवाद.....🙏🌹 ...........................................................      अवश्य ही संसार में सुकरात एक विशेष व्यक्ति थे। उनका मत वही था जो संतों का है। वे लोगों को शिक्षा देते थे। बहुत लोग उनके पास जाते थे।      कोई बूढ़ी उनके पास अपने पोते को लेकर गई। सुकरात ने पूछा — "इसने कुछ पढ़ा भी है?" बुढ़िया बोली — "पढ़ा तो है लेकिन आपकी विशेष शिक्षा लेना चाहता है।" सुकरात ने कहा — "तो इसके लिए पैसे देने होंगे।" बुढ़िया बोली — "आप तो पढ़ाने के एवज में पैसे नहीं लेते।" सुकरात ने कहा — "जितना पढ़ा है, उसको भुला देने के लिए पैसे मांगता हूं, पढ़ाने के लिए नहीं।"      मतलब यह कि जो ज्ञान पढ़ा हुआ है, वह भूल जाए, बड़ी मुश्किल है। संतों का ज्ञान ऐसा होता है कि वह भुलाने योग्य नहीं। .......................................................

परमात्मा से क्या मांगो?

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नमस्कार दोस्तों........🙏🌹. SURENDRASPIRITUALS.BLOGSPOT.COM पर आपका  पुनः स्वागत है। हमेशा की तरह एक बार फिर मैं आप सबके सम्मुख 20 वीं सदी के महान संत सद्गुरु महर्षि मेंहीं   परमहंस जी महाराज  की अमृत वाणी को कथारूप में  प्रस्तुत करने जा रहा हूं। मुझे आशा है कि मेरा यह सद्प्रयास आप सबको पसन्द आएगा। ................................................................                     परमात्मा (ईश्वर)       ईश्वर की भक्ति में स्तुति, प्रार्थना और उपासना; तीन बातें होती हैं। इसमें सब संतों के ख्याल का मेल है। स्तुति कहते हैं — बड़ाई करने को, गुणगान करने को। प्रार्थना कहते हैं – नम्रतापूर्वक कुछ माँगने को। सबका हृदय कुछ–न–कुछ मांगता है। क्या मांगो और किससे मांगो? जो बात विशेष फलदायक हो, वह मांगो और जो सब कुछ दे सकें, उनसे मांगो, दूसरे से मांग कर क्या करोगे?                गोस्वामी तुलसीदास गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है —       देव दनुज मुनि नाग मन...

संसार में रहने की कला

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       नमस्कार दोस्तों.......🙏🌹. SURENDRASPIRITUALS.BLOGSPOT.COM में आपका पुनः स्वागत है। आज मैं एक बार फिर से आप सबको महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज की अमृत वाणी का पान कराऊँगा। आशा है आप सबको मेरा यह प्रयास पसन्द आएगा। धन्यवाद।           महर्षि वेदव्यासजी महाराज        शुकदेव मुनि जी महाराज महाराज जनक                   रसोइया                   व्यासदेवजी के पुत्र थे शुकदेव मुनि जो बचपन से ही बड़े ज्ञानी थे। व्यासदेवजी को मालूम हुआ कि इनको गृहस्थी की बात मालूम नहीं है। इनको गृहस्थी की बात सिखा दें। इसलिए उन्होंने इनको राजा जनकजी के पास भेजा। शुकदेव मुनि उनके दरवाजे पर जाकर खड़े हो गए। दरबान से कहा — "जाकर राजा से कहिए, मैं वेदव्यासजी का पुत्र शुकदेव हूं।" राजा जनक ने कहा — "उनको कहो, वहां ही खड़े रहने के लिए।"         सात दिन बीत गए, तब बुलाए गए और रसोइए से कहा — "इनको भोजन कराओ।" ब्राह्मण रसोइए स...