झूठ का परिणाम (कर्ण की कथा)| JHUTH KA PARINAM ( KARN KI KATHA)
नमस्कार दोस्तों......🙏🌹. आज मैं आप सबके सम्मुख संत आचार्य श्री शचीकांत स्वामी जी महाराज रचित आध्यात्मिक पुस्तक "संत बोध कथाएँ" से एक कथा " झूठ का परिणाम" (कर्ण की कथा) लेकर उपस्थित हुआ हूँ। आशा करता हूँ कि आप सबको मेरा यह सद्प्रयास पसन्द आएगा।
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कर्ण ने सुना, अभी भीष्म पितामह अद्वितीय धनुर्धर हैं। इनके आगे इन्द्र और शंकर भी गम खाते हैं। भीष्म की प्रशंसा सुन कर कर्ण ने पता करना शुरू किया कि आखिर भीष्म यह विद्या या तालीम कहाँ जाकर, किससे पढ़ कर हासिल किए हैं। पता लग गया। वह मन ही मन....... बिना किसी के आगे बोले निर्णय किया कि मैं भी उन्हीं से जाकर वह अमोघ धनुर्विद्या सीख कर दादा जी के आगे अपना अद्भुत हस्त लाघव चमत्कार दिखलाऊँगा।
- कर्ण बड़ा ही साहसी, अभिवादनशील और कट्टर–सिद्धांतवादी था। ज्ञातव्य सूत्र के मुताबिक वह तैयार होकर महेन्द्र पर्वत पर विराजमान परशुराम जी के पास जाकर उनके पावन युगल श्रीचरणों में अपना प्रणाम निवेदित करके हाथ जोड़े चरणों में खड़ा हो गया। जब तक गुरु आज्ञा नहीं हुई, वह घंटों परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए यों ही खड़ा रह गया। कुछ काल पश्चात् परशुराम जी की आँखें खुलीं। सामने खड़े अपरिचित व्यक्ति को देख कर उनसे परिचय पूछा। कर्ण ने सोचा, यदि मैं निषादराज विराध पुत्र कह दूँ तो शायद अपवित्र जाति का जानकर इनकी कृपा मुझको छँटनी कर दे सकती हैं अथवा यदि मैं कुन्ती पुत्र क्षत्रिय कुमार कह दूँ तो परम प्रिय भीष्म को अद्वितीय ठहराने के लिए भी एकलव्य की तरह मैं दूर हटा दिया जा सकता हूँ। इसीलिए ऐसा पता कह देता हूँ जिससे पुत्रवत प्यार के साथ मुझको शिष्य रूप में स्वीकार करके मनोयोगपूर्वक पढ़ावेंगे। अंत में भीतर कपट करके ऊपर से चिकनी–चुपड़ी बातें करते हुए उसने कहा– मैं भार्गव गोत्रीय ब्राह्मण पुत्र हूँ, जिज्ञासु बन कर आपकी शरण में आया हूँ, हे भगवन! मुझको शिष्य रूप में स्वीकार करके अपनी विद्या प्रदान करने की कृपा करें। इतनी बातें सुनकर नामांकन कर लिया गया। दूसरे दिन से पुत्रवत स्नेह पूर्वक पढ़ाई शुरू हो गई। कर्ण अपनी चुंबकीय मेधाशक्ति से सब ग्रहण करते गया। इस प्रकार अपनी गुरुभक्ति से कर्ण ने गुरूजी की सारी विद्याएँ सीख लीं। पढ़ लिख कर कर्ण को तालीम हुआ जानकर परशुराम जी ने उसकी परीक्षा लेनी आवश्यक समझकर एक समय भोजनोपरान्त आसनबद्ध बैठे कर्ण की गोद में अपना माथा रख कर योग निद्रा में सो गए। बाहर से तो जड़वत अवश्य थे परन्तु भीतर में शब्दब्रह्म में सुरत को लीन करके, जड़ प्रकृति के सारे आवरणों को पार करके सच्चिदानन्द की दिव्य जाग्रतावस्था अथवा सहज समाधि की अवस्था में पूर्ण सचेष्ट होकर थे। जिससे विज्ञानावस्था में रह कर बाहर–भीतर का सब कुछ ज्ञान रखते थे।
- दिव्य अवस्था में रहते हुए उन्होंने योग–माया का संचार किया। उस समय पर्वत को फोड़कर एक कीट निकलकर आसन में बैठे कर्ण की जाँघ के चमड़े को काटकर रक्त, माँस खाना–पीना शुरू कर दिया। कर्ण सब समझ रहा था, परन्त गुरुभक्ति सबसे कठिन कार्य जानकर हिमाचल की तरह अचल रहा। बाद में गुरुदेव परशुराम जी ने अपनी योग–माया का विसर्जन करके आसन में विराजमान होकर कहा– तुम आज सच्ची बात मुझसे कहो कि कौन हो। क्योंकि नामांकन के दिन तुमने भार्गव गोत्रिय ब्राह्मण के नाम से अपना पूरा परिचय लिखवाया था। परन्त आज मुझको शंका हो रही है, क्योंकि इतना बड़ा साहस किसी क्षत्रिय का गुण है, ब्राह्मण का नहीं। कर्ण का सारा शरीर काँप उठा। वह बोला– गुरुदेव! जो शंका आपको हो रही है, वह सर्वथा सत्य है। चिकनी–चुपड़ी बातें करने का स्वाभाविक गुण कर्ण में था। इसी से साफ नहीं कह कर उसने कपट पूर्ण झूठ व्यवहार अपने गुरुदेव से किया। परशुराम जी के मुखारविंद से निकल गया– कर्ण! मैंने बड़ा ही मन लगा कर तुमको पढ़ाया परन्तु तुमने कपट करके जो विद्या सीखी है, यह अवसर आने पर कामयाब नहीं होगी और तुम स्वयं सब भूल जाओगे। महाभारत युद्ध में तुम्हारी हार हो जाएगी। यहाँ तक कि तुम वहाँ मारे चले जाओगे। इसीलिए कहा गया है– "गुरु से कपट, मित्र से चोरी, की होय निर्धन, की होय कोढ़ी" कथन का फल मिलने से निर्धन और कोढ़ का दुःसह दुःख भुगतना पड़ता है। धर्मग्रंथ इसका प्रमाण है।
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- आज के लिए बस इतना ही। बहुत जल्द ऐसा ही दिव्य ज्ञानयुक्त प्रवचन पीयूष लेकर उपस्थित होऊँगा। तब तक के लिए शुभ विदा। जय गुरु महाराज....🙏🙏
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