अद्वय भाव कैसा होना चाहिए | WHAT KIND OF BEING ONENESS SHOULD BE?
संत सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज की वाणी.................... ............................................................ यह जो भादो में अनन्त पूजा होती है, वह अनन्त नहीं है। यथार्थ में अनन्त होना चाहिए। वह एक परमात्मा है। जैसे शून्य में कोई थाह नहीं मालूम होती कि वह कहाँ तक है। वायुयान जाए, चाहे कोई पक्षी उड़े तो शून्य का अंत नहीं होगा। इसी तरह जो लोग विशेषज्ञ हैं, वे ईश्वर को जानते हैं। साधक लोग केवल जानते ही नहीं हैं, प्रत्यक्ष करके पहचानते भी हैं। पहचान लेने पर परमात्मा से अद्वय भाव हो जाता है। परमात्मा मुझसे अलग है, ऐसा नहीं; बल्कि मैं और परमात्मा एक ही हूँ – यह है अद्वय भाव। इसमें कुछ करना नहीं होता। सब चुप हो जाते हैं। श्रीराम ने गुरु वशिष्ठ से पूछा था कि अद्वय भाव कैसा होता है? तो वे चुप रहे। श्रीराम ने पुनः पूछा – "गुरु महाराज! आप रुष्ट तो नहीं हो गए हैं? मैं पूछता हूँ और उत्तर नहीं देते?" वशिष्ठ जी ने कहा – " तुम जबसे पूछ रहे हो, मैं तबसे उत्तर दे रहा हूँ। अद्वय भाव में चुप ही रहना होता है।" इसलिए मैं ...