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अद्वय भाव कैसा होना चाहिए | WHAT KIND OF BEING ONENESS SHOULD BE?

संत सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज की वाणी.................... ............................................................      यह जो भादो में अनन्त पूजा होती है, वह अनन्त नहीं है। यथार्थ में अनन्त होना चाहिए। वह एक परमात्मा है। जैसे शून्य में कोई थाह नहीं मालूम होती कि वह कहाँ तक है। वायुयान जाए, चाहे कोई पक्षी उड़े तो शून्य का अंत नहीं होगा। इसी तरह जो लोग विशेषज्ञ हैं, वे ईश्वर को जानते हैं। साधक लोग केवल जानते ही नहीं हैं, प्रत्यक्ष करके पहचानते भी हैं। पहचान लेने पर परमात्मा से अद्वय भाव हो जाता है।      परमात्मा मुझसे अलग है, ऐसा नहीं; बल्कि मैं और परमात्मा एक ही हूँ – यह है अद्वय भाव। इसमें कुछ करना नहीं होता। सब चुप हो जाते हैं। श्रीराम ने गुरु वशिष्ठ से पूछा था कि अद्वय भाव कैसा होता है? तो वे चुप रहे। श्रीराम ने पुनः पूछा – "गुरु महाराज! आप रुष्ट तो नहीं हो गए हैं? मैं पूछता हूँ और उत्तर नहीं देते?" वशिष्ठ जी ने कहा – " तुम जबसे पूछ रहे हो, मैं तबसे उत्तर दे रहा हूँ। अद्वय भाव में चुप ही रहना  होता है।"      इसलिए मैं ...

गुरु में निष्ठा रखें

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                   नमस्कार दोस्तों....🙏🌹. आज मैं एक बार फिर परम संत सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज की अमृतमय वाणी लेकर उपस्थित हुआ हूँ। आशा है आप सभी को मेरा यह प्रयास पसन्द आएगा। .............................................................................................................. बात–बात में गुरु की आवश्यकता होती है। बिना गुरु के एक अक्षर नहीं सीख सकते। इसलिए ऐसी भक्ति करो कि जिसका अंदाजा नहीं। सदा गुरु के साथ कोई रहे, यह भी संभव नहीं। इसलिए कबीर साहब ने कहा है –  जौं गुरु बसै बनारसी, शिष्य समुन्दर तीर।   एक पलक बिछुड़ैं नहीं, जौं गुन होय शरीर।।         हमेशा गुरु की याद करो। द्वापर युग में द्रोण एक गुरु हुए थे। कौरव–पाण्डव को वे धनुर्विद्या सिखलाते थे। एक भील–पुत्र भी गया, उनसे सीखने के लिए तो आचार्य द्रोण ने कहा–"मैं राजकुमारों को सिखलाता हूँ, दूसरे को नहीं।" वह भील–पुत्र था एकलव्य। उसने द्रोणाचार्य की मूर्ति बनाई और उसका ध्यान करते हुए धनुर्विद्या का अभ्यास करने लगा। होते–होते उस विद्य...