गुरु में निष्ठा रखें

                   नमस्कार दोस्तों....🙏🌹. आज मैं एक बार फिर परम संत सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज की अमृतमय वाणी लेकर उपस्थित हुआ हूँ। आशा है आप सभी को मेरा यह प्रयास पसन्द आएगा।
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बात–बात में गुरु की आवश्यकता होती है। बिना गुरु के एक अक्षर नहीं सीख सकते। इसलिए ऐसी भक्ति करो कि जिसका अंदाजा नहीं। सदा गुरु के साथ कोई रहे, यह भी संभव नहीं। इसलिए कबीर साहब ने कहा है – 
जौं गुरु बसै बनारसी, शिष्य समुन्दर तीर। एक पलक बिछुड़ैं नहीं, जौं गुन होय शरीर।।

        हमेशा गुरु की याद करो। द्वापर युग में द्रोण एक गुरु हुए थे। कौरव–पाण्डव को वे धनुर्विद्या सिखलाते थे। एक भील–पुत्र भी गया, उनसे सीखने के लिए तो आचार्य द्रोण ने कहा–"मैं राजकुमारों को सिखलाता हूँ, दूसरे को नहीं।" वह भील–पुत्र था एकलव्य। उसने द्रोणाचार्य की मूर्ति बनाई और उसका ध्यान करते हुए धनुर्विद्या का अभ्यास करने लगा। होते–होते उस विद्या में वह इतना प्रवीण हुआ कि जितना अर्जुन भी नहीं था। एक दिन वे लोग जंगल में घूम रहे थे। एक कुत्ता भी उनके साथ था। वह कुत्ता एकलव्य को देख कर भौंका तो एकलव्य ने उस कुत्ते के मुँह में इतने तीर मारे कि उसका मुँह तीरों से भर गया लेकिन एक बूँद भी खून नहीं गिरा। कुत्ता जब इन लोगों के पास वापस आया तो इनलोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ। उस कुत्ते के पीछे–पीछे वे लोग चले। वह कुत्ता एकलव्य की कुटिया के पास खड़ा हो गया। द्रोणाचार्य ने पूछा – "यह विद्या तुमने किससे सीखी?" एकलव्य ने कहा – "आपसे। आपकी मूर्ति बना कर और उसका ध्यान करके मैंने इस विद्या को हासिल किया।" 

        

        कहने का तात्पर्य यह है कि जिसको गुरु में ज्यादा निष्ठा होती है, वह किसी–न–किसी तरह विद्या पाता है। गुरु के ख्याल से, गुरु के संग से लोग विद्या पाते हैं।


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आज के लिए बस इतना ही दोस्तों। बहुत जल्द अगले पोस्ट में मिलता हूँ। तब तक के लिए शुभ विदा......🙏🌹



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