अद्वय भाव कैसा होना चाहिए | WHAT KIND OF BEING ONENESS SHOULD BE?
संत सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज की वाणी....................
यह जो भादो में अनन्त पूजा होती है, वह अनन्त नहीं है। यथार्थ में अनन्त होना चाहिए। वह एक परमात्मा है। जैसे शून्य में कोई थाह नहीं मालूम होती कि वह कहाँ तक है। वायुयान जाए, चाहे कोई पक्षी उड़े तो शून्य का अंत नहीं होगा। इसी तरह जो लोग विशेषज्ञ हैं, वे ईश्वर को जानते हैं। साधक लोग केवल जानते ही नहीं हैं, प्रत्यक्ष करके पहचानते भी हैं। पहचान लेने पर परमात्मा से अद्वय भाव हो जाता है।
परमात्मा मुझसे अलग है, ऐसा नहीं; बल्कि मैं और परमात्मा एक ही हूँ – यह है अद्वय भाव। इसमें कुछ करना नहीं होता। सब चुप हो जाते हैं। श्रीराम ने गुरु वशिष्ठ से पूछा था कि अद्वय भाव कैसा होता है? तो वे चुप रहे। श्रीराम ने पुनः पूछा – "गुरु महाराज! आप रुष्ट तो नहीं हो गए हैं? मैं पूछता हूँ और उत्तर नहीं देते?" वशिष्ठ जी ने कहा – " तुम जबसे पूछ रहे हो, मैं तबसे उत्तर दे रहा हूँ। अद्वय भाव में चुप ही रहना होता है।"
इसलिए मैं कहता हूँ कि संतमत– सत्संग का विषय बड़ा गंभीर है। इसके सद्गुणों को धारण करो, पापों को छोड़ो। सत्संग करो।
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(1) प्रथम पैराग्राफ :– अनन्त पूजा का यथार्थ और परमात्मा का महत्व के बारे में।
(2) द्वितीय पैराग्राफ :– अद्वय भाव तथा श्रीराम एवं गुरु वशिष्ठ संवाद के बारे में।
(3) तृतीय पैराग्राफ :– संतमत सत्संग का महत्व के बारे में।
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FAQ :–
(1) वास्तविक अनन्त पूजा क्या है?
उत्तर :– भादो में की जाने वाली पूजा अनन्त पूजा नहीं बल्कि वास्तविक अनन्त पूजा परमात्मा की भक्ति है।
(2) अद्वय भाव क्या है?
उत्तर :– सब जान कर भी चुप रहना अद्वय भाव कहलाता है।
(3) अद्वय भाव कैसे होता है?
उत्तर :– परमात्मा को न सिर्फ जानने बल्कि प्रत्यक्ष रूप से पहचान लेने पर उनसे अद्वय भाव हो जाता है।
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आज के लिए बस इतना ही दोस्तों। बहुत जल्द अगले पोस्ट में किसी ऐसे ही भक्तिमय टॉपिक के साथ उपस्थित होऊँगा। तब तक के लिए नमस्कार...🙏🌹
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Bahut hi badhiya Blog. Meri shubhkamnayen tumhare sath hain......🙌
जवाब देंहटाएंDhanyawad.....🙏🌹
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