संसार में रहने की कला

       नमस्कार दोस्तों.......🙏🌹. SURENDRASPIRITUALS.BLOGSPOT.COM में आपका पुनः स्वागत है। आज मैं एक बार फिर से आप सबको महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज की अमृत वाणी का पान कराऊँगा। आशा है आप सबको मेरा यह प्रयास पसन्द आएगा। धन्यवाद।

          महर्षि वेदव्यासजी महाराज

       शुकदेव मुनि जी महाराज


महाराज जनक

                  रसोइया

        

         व्यासदेवजी के पुत्र थे शुकदेव मुनि जो बचपन से ही बड़े ज्ञानी थे। व्यासदेवजी को मालूम हुआ कि इनको गृहस्थी की बात मालूम नहीं है। इनको गृहस्थी की बात सिखा दें। इसलिए उन्होंने इनको राजा जनकजी के पास भेजा। शुकदेव मुनि उनके दरवाजे पर जाकर खड़े हो गए। दरबान से कहा — "जाकर राजा से कहिए, मैं वेदव्यासजी का पुत्र शुकदेव हूं।" राजा जनक ने कहा — "उनको कहो, वहां ही खड़े रहने के लिए।"

        सात दिन बीत गए, तब बुलाए गए और रसोइए से कहा — "इनको भोजन कराओ।" ब्राह्मण रसोइए से कहा — "इनको ऐसे स्थान पर बिठाना जहाँ छत फूटी हो और एक पतली डोरी से पत्थर लटका दो।" वैसा ही उन्होंने किया। 

        नैवेद्य उत्सर्ग करके शुकदेवजी भोजन करनेवाले ही थे कि रसोइए ने कहा — "ऊपर देखिए, पत्थर गिरने ही वाला है।" उनका ख्याल उस ओर चला गया। नाना प्रकार के भोजन बने थे लेकिन जल्दी–जल्दी में खाया कि कहीं पत्थर गिर न जाए। 

        फिर उनके दोनों हाथों के कोवे में पानी भरा कटोरा रख दिया और उनके हाथों को बाँध दिया। राजा ने सिपाही से कहा — "बाजार में घुमा आओ। यदि कटोरे से एक बूंद भी पानी गिरे तो इनका सिर काट लेना।" 

        उनको घुमाया गया बाजार में। शुकदेवजी कटोरे को देखते हुए चलते हैं आहिस्ते–आहिस्ते कि कहीं कटोरे का पानी गिर न जाए। तमाम बाजार घूम आए।

        बाद में राजा जनक ने उनको अपने नजदीक बिठाया। उनसे पहले भोजन का स्वाद पूछा। शुकदेव मुनि ने कहा — "भोजन का स्वाद क्या मालूम पड़ता! डर के मारे कुछ स्वाद नहीं मालूम पड़ा। फिर राजा ने पूछा — "बाजार देखा?" शुकदेव मुनि ने कहा — "बाजार में क्या अच्छा है, कैसी दुकान है, मैंने कुछ नहीं देखा।"

        राजा जनक ने कहा — "यही मेरी शिक्षा है।" शुकदेव मुनि ने कहा — "क्या शिक्षा हुई, मैने समझा नहीं।" राजा जनक ने कहा — "तमाम में रहो, सब स्वाद, भोजन हो परन्त स्वाद कुछ मालूम नहीं पड़े। सब कुछ देखो, अच्छा–बुरा परन्तु मन किसी में लगे नहीं।"

        शुकदेव मुनि ने पूछा — "ऐसा किस तरह होगा?" राजा ने कहा — "ऐसा इस तरह होगा कि तुम जो हो, अपने को पहचानो। अपने को जानते हो कि कि मैं कौन हूं? शुकदेव मुनि ने कहा — "जानता हूं कि मैं देह नहीं, आत्मा हूं।" राजा जनक ने पूछा — "सुनकर जाने हो कि पहचानकर जाने हो?" शुकदेव मुनि ने कहा — "सुनकर जाना है।" राजा जनक ने कहा — "पहचानकर जानना बिना गुरु के नहीं होता है।"

         इसके लिए जो विद्या हमारे यहाँ प्राचीन काल से चली आ रही है, उसी को कहते हैं — योग। पहले तो सुना–सुनाया हुआ ज्ञान हुआ। दुनिया में किस तरह रहो। दुनिया के भोगों में भी रहो लेकिन निर्लिप्त रहो। इसके लिए विद्या है — योग। बिना योग के यह काम नहीं हो सकता।

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