भक्ति का तात्पर्य

प्यारे दोस्तों। मैं आप सबके सम्मुख परम संत सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंसजी महाराज जी की वाणी लेकर उपस्थित हूं। आशा है कि आप सबको यह पसंद आएगा।
      पूज्य गुरुदेव कहते हैं कि ईश्वर की भक्ति कीजिए अर्थात् आध्यात्मिकता की ओर चलिए। योग, ज्ञान और ईश्वर-भक्ति; सब संग-संग मिले-जुले हैं। बिना ज्ञान के किसकी भक्ति हो, जान नहीं सकते। भक्ति सेवा को कहते हैं। सेवा में क्या ईश्वर का पैर दबाया जाए या उनको कोई बीमारी है जो उनकी चिकित्सा की जाए? परन्तु परमात्मा के लिए यह सेवा साधारण लोगों के लिए है।





      एक राजा शिकार खेलने के लिए जंगल गया। वहां उसने एक भोले-भाले सुन्दर बालक को देखा। उस बालक की सुन्दरता पर मुग्ध होकर राजा ने उसे अपने यहां ले जाने की इच्छा उस बालक के समक्ष प्रकट की। बालक बोला - "राजा ! यदि तुम मेरी इन शर्तों को मंजूर करो तो मैं तुम्हारे साथ जाऊं।" शर्त यह थी कि "मुझे खिलाओ, तुम मत खाओ, मुझे अच्छे-अच्छे वस्त्र पहनाओ, तुम मत पहनो तथा मुझे सुलाओ, तुम मत सोओ, तुम जगकर मेरी रक्षा करो।"
        राजा ने कहा - "ऐसा तो नहीं होगा किन्तु मैं जैसा खाऊंगा तथा पहनूंगा, उसी तरह तुम्हें खिलाऊंगा तथा पहनाऊंगा और जिस तरह मेरे सोने पर पहरेदार पहरा करते हैं, उसी तरह तुम्हारे सोने पर भी पहरा होगा।"
        बालक बोला - "मुझे ऐसा मालिक नहीं चाहिए। मेरा मालिक तो मुझे खिलाता है किन्तु स्वयं नहीं खाता। मुझे वस्त्र पहनाता है किन्तु स्वयं नहीं पहनता। मैं सोता हूं और वह जगकर मेरा पहरा करता है।"
        परमात्मा के लिए खाना-पीना, पहनना और सोना नहीं। उस प्रभु की सेवा क्या होगी? उनके पास जाओ, अपने को उनके पास हाजिर करो, यही सेवा है। 
        गुरु नानक देव जी ने कहा है-----
        ऐसी    सेवकु     सेवा    करै।
        जिसका जीऊ तिसु आगे धरै।
-------------------------------------------------------------------------------------------
आज के लिए बस इतना ही। मिलते हैं फिर अगले ब्लॉग में जिसमें मैं आपको भक्तिरस में डुबोने की पूरी कोशिश करूंगा। आप सब मेरे इस ब्लॉग को लाइक कीजिए, शेयर कीजिए और कमेंट कीजिए। एक बात और.........अगर ये ब्लॉग पसंद आए तो मुझे फाॅलो करना मत भूलिएगा। धन्यवाद......🙏🌹

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

विद्या ददाति विनयम्

भगवान श्रीकृष्ण की योगशक्ति

संसार में रहने की कला